नगर पालिका में शिलापट्टों पर नाम का विवाद
कुशीनगर नगर पालिका परिषद के विकास कार्यों के शिलापट्टों पर नपाध्यक्ष किरन जायसवाल के नाम के साथ उनके पति का नाम जोड़कर ‘किरन राकेश जायसवाल’ लिखे जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। सवाल यह है कि यदि आधिकारिक रिकॉर्ड में नाम ‘किरन जायसवाल’ दर्ज है, तो सरकारी शिलापट्टों पर यह परिवर्तन किस नियम के तहत किया गया। यह मामला अब केवल नाम की वर्तनी का नहीं, बल्कि सरकारी प्रोटोकॉल और जवाबदेही का बन गया है।
शासनादेश और प्रोटोकॉल का उल्लंघन
नगर विकास विभाग ने शिलापट्टों पर जनप्रतिनिधियों के नाम अंकित करने को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। 31 जुलाई 2025 और 29 मई 2025 के शासनादेशों के अनुसार, शिलालेख और पट्टिकाएं लगाने की एक निश्चित प्रक्रिया निर्धारित है। इसके अतिरिक्त, जून 2026 में शासन ने शिलापट्टों पर अंकित नाम और फोटो को प्रमाणित कराने के निर्देश दिए थे। नगर पालिका प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन शिलापट्टों का डिजाइन और नामांकन किसी सक्षम अधिकारी की अनुमति से हुआ है, या इसे नियमों के विरुद्ध जाकर अंकित किया गया है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप और शासन के निर्देश
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 10 अक्टूबर 2012 को जारी शासनादेश संख्या 3905/नौ-1-2012 के तहत, स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिला पदाधिकारियों के पति या संबंधियों द्वारा प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप पर पूर्ण प्रतिबंध है। शासन का स्पष्ट निर्देश है कि निर्वाचित पदाधिकारी अपने दायित्वों का निर्वहन स्वयं करें। ऐसे में शिलापट्टों पर पति का नाम जोड़ने से यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या यह प्रशासनिक गरिमा और शासन के निर्देशों का उल्लंघन है।
जांच और सरकारी धन की वसूली
स्थानीय बुद्धिजीवियों और जानकारों का मानना है कि यदि प्रशासन द्वारा मामले की निष्पक्ष जांच की जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि यह चूक कैसे हुई। जांच के दायरे में निम्नलिखित बिंदु प्रमुख हैं:
- नगर पालिका के आधिकारिक रिकॉर्ड में अध्यक्ष का सही नाम क्या है?
- शिलापट्टों का प्रारूप किस प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत किया गया?
- क्या इस पर सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है?
यदि जांच में नाम गलत पाया जाता है, तो इन शिलापट्टों को हटाने और नए पत्थर लगवाने पर होने वाले खर्च की जिम्मेदारी किसकी होगी? विशेषज्ञों के अनुसार, यदि नियमों का उल्लंघन सिद्ध होता है, तो संबंधितों से सरकारी धन की क्षति की वसूली और जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई की जानी चाहिए। अब सबकी निगाहें जिलाधिकारी कार्यालय पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में कोई प्रशासनिक जांच बिठाई जाएगी या नहीं।