गंडक का बदलता प्रवाह और तटवर्ती गांवों पर संकट
कुशीनगर जिले में गंडक नदी की जलप्रवाह प्रवृत्ति में आए बदलाव से तटवर्ती इलाकों के निवासियों की चिंताएं बढ़ गई हैं। पिछले 15 वर्षों में नदी का स्वरूप इतना बदल चुका है कि अब महज एक से डेढ़ लाख क्यूसेक पानी के डिस्चार्ज पर ही तटबंधों के करीब खतरा महसूस होने लगता है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, पहले नदी इन तटबंधों से काफी दूर प्रवाहित होती थी, लेकिन अब हर साल लगभग 200 मीटर का रास्ता बदलकर यह तटबंधों के करीब पहुंच रही है।
भूगोल बदलने का दंश: अहिरौलीदान से पिपराघाट तक का हाल
नदी के मार्ग बदलने के कारण वर्ष 2012 के बाद से सेवरही क्षेत्र के कई गांव अपना वजूद खो चुके हैं। बैरिया टोला, एकरी टोला और पिपराघाट ग्राम सभा के फल टोला, नान्हू टोला व गोवर्धन टोला जैसे कई छोटे टोले पूरी तरह नदी में विलीन हो गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब गंडक नदी सीधे एपी और नरवाजोत तटबंध के साथ सटकर बह रही है, जिससे सैकड़ों परिवारों की सुरक्षा दांव पर लगी है।
विशेषज्ञों की राय और बाढ़ खंड का पक्ष
भूगोल विशेषज्ञों का मानना है कि नदी की तली में जमा गाद (सिल्ट) और जलप्रवाह क्षमता में आई कमी इसके मुख्य कारण हैं। बुद्ध पीजी कॉलेज के प्रो. कौस्तुभ नारायण मिश्र के अनुसार, नदी द्वारा लाए गए अवसाद का जमाव और प्राकृतिक प्रवाह में बाधाएं मार्ग परिवर्तन को जन्म देती हैं। वहीं, बाढ़ खंड गोरखपुर के एक्सईएन एमके सिंह का कहना है कि स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और तटवर्ती इलाकों में सुरक्षा के सभी इंतजाम पूरे कर लिए गए हैं। फिलहाल तटबंध सुरक्षित हैं और घबराने की आवश्यकता नहीं है।