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गोरखपुर की गीता वाटिका: 52 वर्षों से अनवरत जारी है हरि नाम संकीर्तन

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गीता वाटिका का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व

गोरखपुर स्थित गीता वाटिका न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह अध्यात्म और भक्ति की एक अनूठी धरोहर भी है। वर्ष 1934 में खरीदी गई यह भूमि आज समूचे उत्तर भारत में श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध इस परिसर में 16 गर्भगृह और 35 शिखर हैं, जो इसे एक भव्य आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करते हैं।

52 वर्षों से जारी अखंड हरि नाम संकीर्तन

गीता वाटिका में भक्ति की परंपरा का एक बड़ा ऐतिहासिक संदर्भ वर्ष 1968 से जुड़ा है। इससे तीन वर्ष पूर्व, 1965 में यहाँ गिरिराज जी की परिक्रमा का अनुष्ठान शुरू किया गया था। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, राधाष्टमी के पावन अवसर पर भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने ‘अखंड हरि नाम संकीर्तन’ का संकल्प लिया था। तब से लेकर आज तक, यह संकीर्तन निरंतर जारी है।

परंपरा का निर्वहन और भाईजी का योगदान

बीते 52 वर्षों में समय के साथ बहुत कुछ बदला—परिस्थितियां बदलीं, लोग आए और गए, लेकिन गीता वाटिका में हरि नाम का उद्घोष थमा नहीं है। यह अनुष्ठान भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार की दूरदर्शिता और उनकी ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा का प्रमाण है। वर्ष 1971 में भाईजी के निधन के उपरांत भी, उनके द्वारा स्थापित यह परंपरा उतनी ही ऊर्जा के साथ आज भी संचालित हो रही है। भक्तों और स्थानीय निवासियों के लिए यह स्थान निरंतर चलने वाले कीर्तन के कारण आस्था का एक जीवंत केंद्र बना हुआ है।

आध्यात्मिक विरासत का संरक्षण

गीता वाटिका आज केवल एक परिसर नहीं, बल्कि गोरखपुर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। प्रतिदिन होने वाले इस संकीर्तन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। 16 गर्भगृहों के माध्यम से यहाँ की गई मूर्तिकला और वास्तुकला नक्काशी भी दर्शकों को आकर्षित करती है। यह स्थल भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के उन आदर्शों को जीवंत बनाए रखता है, जिन्होंने जन-जन तक ईश्वर भक्ति के संदेश को पहुँचाने का कार्य किया था। आज भी यहाँ आने वाले श्रद्धालु इस अखंड ध्वनि में शांति और आत्मिक सुख की अनुभूति करते हैं।

(संवाददाता)

पूर्वांचल ब्यूरो न्यूज़ डेस्क रिपोर्टर।

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