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चिल्लूपार विधानसभा चुनाव 2027: बसपा के ठाकुर कार्ड से बदला समीकरण

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पूर्वांचल की सियासत में चिल्लूपार का महत्व

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्वांचल का गोरखपुर जिला हमेशा से सत्ता का प्रमुख केंद्र रहा है, और इसमें भी चिल्लूपार विधानसभा सीट का सियासी इतिहास अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है। बीते कई दशकों से यह सीट ‘गोरखनाथ मठ’ और ‘तिवारी हाता’ के बीच वर्चस्व की पारंपरिक लड़ाई का प्रमुख अखाड़ा रही है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से ही सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी (SP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) जहां एक बार फिर ब्राह्मण चेहरों पर अपना दांव लगाने की जुगत में हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने मास्टरस्ट्रोक चलते हुए अस्मिता चंद को अपना उम्मीदवार घोषित कर इस मुकाबले को ‘ठाकुर बनाम ब्राह्मण’ के दिलचस्प त्रिकोणीय संघर्ष में बदल दिया है।

तिवारी हाता की विरासत और सपा की चुनौती

चिल्लूपार विधानसभा सीट का इतिहास दिग्गज नेता स्वर्गीय पंडित हरिशंकर तिवारी के नाम के बिना अधूरा माना जाता है। वर्ष 1976 में परिसीमन के बाद वजूद में आई इस सीट पर हरिशंकर तिवारी ने 1985 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज कर इतिहास रचा था और 1985 से लेकर 2007 तक वे लगातार छह बार विधायक व मंत्री रहे। उनके निधन के बाद ‘तिवारी हाता’ के प्रभाव को बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी उनके बेटे विनय शंकर तिवारी के कंधों पर है। 2022 में भाजपा के राजेश त्रिपाठी से हारने के बाद, विनय तिवारी 2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर एक बार फिर इस पारंपरिक किले को वापस पाने की जोरदार तैयारी कर रहे हैं।

बसपा का बड़ा दांव: अस्मिता चंद के जरिए साधा समीकरण

इस बार के चुनाव में सबसे पहले अपने पत्ते खोलते हुए मायावती की पार्टी बसपा ने बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया है। भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष रहीं अस्मिता चंद ने पार्टी बदलते हुए बसपा का दामन थामा और उन्हें चिल्लूपार से प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। उनकी उम्मीदवारी के पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:

  • मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि: अस्मिता चंद राजपूत (ठाकुर) समुदाय से आती हैं और उनका परिवार पूर्वांचल की राजनीति में रसूख रखता है। उनके ससुर स्व. राजनारायण चंद ब्लॉक प्रमुख और ससुर के बड़े भाई मारकंडे चंद तत्कालीन धुरियापार सीट से चार बार विधायक व मंत्री रह चुके हैं।
  • जातीय समीकरण: चिल्लूपार को पारंपरिक रूप से ब्राह्मण बहुल सीट माना जाता है, जहां करीब 1 लाख ब्राह्मण और 90 हजार दलित मतदाता हैं। परिसीमन के बाद धुरियापार क्षेत्र के जुड़ने से करीब 20-25 हजार ठाकुर वोटर अब निर्णायक भूमिका में हैं।

भाजपा की आंतरिक प्रतिस्पर्धा और मठ का प्रभाव

दूसरी ओर, सत्ताधारी पार्टी भाजपा के भीतर भी टिकट को लेकर तगड़ी दावेदारी चल रही है। वर्तमान विधायक राजेश त्रिपाठी तीसरी बार अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं, लेकिन उनके सामने तेलंगाना के राज्यपाल और भाजपा के वरिष्ठ नेता शिव प्रताप शुक्ला के भतीजे अष्टभुजा शुक्ला भी टिकट की रेस में मजबूती से उभर चुके हैं। अष्टभुजा शुक्ला की क्षेत्र में सक्रियता और हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हुई मुलाकात के बाद से उनकी उम्मीदवारी की चर्चाएं काफी तेज हो गई हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सपा और भाजपा दोनों दल ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारते हैं, तो ब्राह्मण वोटों में बिखराव तय है, जिसका सीधा फायदा बसपा के ‘ठाकुर कार्ड’ को मिल सकता है।

(संवाददाता)

पूर्वांचल ब्यूरो न्यूज़ डेस्क रिपोर्टर।

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