महाराजगंज में 70 साल से कायम रामलीला की गौरवशाली परंपरा
महाराजगंज जिले के नौतनवा कस्बे में 70 वर्षों से चली आ रही रामलीला की परंपरा आज भी उसी आस्था और उत्साह के साथ जारी है। इस आयोजन के संरक्षक लालमन जायसवाल पिछले 35 वर्षों से एक कठिन वचन का पालन कर रहे हैं। वर्ष 1991 में अपने दिवंगत भाई विश्वनाथ जायसवाल को दिए वचन को निभाते हुए लालमन जायसवाल ने न केवल रामलीला की परंपरा को टूटने दिया, बल्कि इसे समय के साथ और अधिक भव्य रूप भी दिया है।
भाई के वचन और रामलीला का इतिहास
नौतनवा में रामलीला की शुरुआत स्व. हजारी राम जायसवाल और स्व. विश्वनाथ जायसवाल द्वारा की गई थी। शुरुआती दौर में यह आयोजन कस्बे के रामजानकी मंदिर परिसर में होता था। समय बीतने के साथ दर्शकों की संख्या में वृद्धि हुई और रामलीला के मंचन को ‘पड़ाव’ मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया। लालमन जायसवाल बताते हैं कि वर्ष 1991 में उनके भाई ने अंतिम समय में उनसे यह संकल्प लिया था कि वे इस सांस्कृतिक विरासत को किसी भी स्थिति में बंद नहीं होने देंगे। आज यह आयोजन न केवल महाराजगंज के निवासियों के लिए बल्कि पड़ोसी देश नेपाल के दर्शकों के लिए भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
बदलता स्वरूप और बढ़ती भव्यता
आयोजन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां शुरुआती वर्षों में रामलीला का पूरा खर्च केवल चार से पांच हजार रुपये होता था, वहीं अब आधुनिक तकनीक और बड़े पैमाने पर मंचन के कारण यह खर्च आठ से दस लाख रुपये तक पहुंच गया है। कमेटी के सदस्यों के अनुसार, रामलीला का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों से जोड़ना है। पुराने समय की यादों को साझा करते हुए स्थानीय लोग बताते हैं कि करीब सात दशक पहले जब संसाधन कम थे, तब दर्शक घर से बोरे लेकर आते थे और पूरी रात बैठकर रामलीला का आनंद लेते थे।
पुलिस और प्रशासन की तैयारियां
इस वर्ष की रामलीला को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। सोमवार शाम से अयोध्या और जनकपुर के कलाकारों द्वारा सजीव मंचन की शुरुआत की जाएगी। बड़ी संख्या में जुटने वाली दर्शकों की भीड़ को नियंत्रित करने और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए हैं। रामलीला कमेटी के संरक्षक राजाराम जायसवाल और अध्यक्ष लालमन जायसवाल ने बताया कि कमेटी का मुख्य उद्देश्य इस परंपरा को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है ताकि भाईचारे और समानता का संदेश निरंतर समाज तक पहुंचता रहे।