पांच साल से वैकल्पिक बिजली व्यवस्था पर निर्भर
महाराजगंज जिला अस्पताल पिछले पांच वर्षों से बिजली की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। लगभग पांच साल पहले एनएच-730 (NH-730) के निर्माण कार्य के दौरान अस्पताल की मुख्य बिजली लाइन कट गई थी, जिसे आज तक बहाल नहीं किया जा सका है। इस तकनीकी खामी के कारण अस्पताल को वर्तमान में मुख्यालय फीडर से वैकल्पिक बिजली आपूर्ति दी जा रही है, जो अस्पताल की जरूरतों के लिए अपर्याप्त साबित हो रही है।
लगातार हो रही बिजली कटौती और मशीनों पर असर
मुख्यालय फीडर में किसी भी प्रकार की तकनीकी खराबी या फॉल्ट आते ही पूरे अस्पताल परिसर की बिजली गुल हो जाती है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, केवल जनरेटर के माध्यम से पूरे परिसर को बिजली उपलब्ध कराना संभव नहीं है, जिससे वोल्टेज में उतार-चढ़ाव की समस्या बनी रहती है। इसका सीधा असर अस्पताल की महत्वपूर्ण चिकित्सा सेवाओं पर पड़ रहा है।
सितंबर माह में बिजली आपूर्ति बाधित होने की कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें एक सितंबर से लेकर 20 सितंबर तक विभिन्न अवधियों में बिजली गुल रही। अस्पताल में उपलब्ध डायलिसिस, सीटी स्कैन और डिजिटल एक्स-रे जैसी अत्याधुनिक मशीनें बिजली के बिना काम नहीं कर पातीं। वोल्टेज की समस्या के चलते परिसर के लगभग 10 में से पांच एसी (AC) को हर समय बंद रखना पड़ता है, जिससे मरीजों और कर्मचारियों को अत्यधिक गर्मी और परेशानी का सामना करना पड़ता है।
ईंधन की खपत और प्रशासन का पक्ष
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि बिजली कटौती के दौरान जनरेटर पर निर्भरता बढ़ने से डीजल की भारी खपत होती है। यदि अस्पताल के पूरे परिसर को 24 घंटे जनरेटर पर चलाया जाए, तो लगभग एक हजार लीटर डीजल की आवश्यकता पड़ती है, जो प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से एक बड़ा बोझ है।
इस मामले पर जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. एके द्विवेदी ने कहा, ‘मुख्य लाइन से संबंधित पुरानी पत्रावलियों की जांच की जाएगी। इसके बाद बिजली निगम के अधिकारियों के साथ वार्ता कर बिजली लाइन को दोबारा जोड़ने का हर संभव प्रयास किया जाएगा।’ अस्पताल को पूर्व में बैकुंठपुर उपकेंद्र से अलग लाइन मिलती थी, जिससे आसपास के क्षेत्र में फाल्ट होने के बावजूद अस्पताल की सेवाएं निर्बाध रहती थीं। अब मरीजों और परिजनों की मांग है कि अस्पताल को बिजली की स्थायी और निर्बाध व्यवस्था जल्द से जल्द मुहैया कराई जाए।