मिलेट्स का बढ़ता महत्व और स्वास्थ्य लाभ
कभी गांवों की चौपालों और सामान्य घरों की थाली का मुख्य हिस्सा रहने वाले मोटे अनाज, जिन्हें अब मिलेट्स के नाम से जाना जाता है, एक बार फिर आधुनिक रसोई में अपनी जगह बना रहे हैं। रागी, बाजरा, ज्वार और कोदो जैसे अनाज अब केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शहरी आबादी भी इनके स्वास्थ्यवर्धक गुणों के कारण इन्हें अपनी डाइट का अनिवार्य हिस्सा बना रही है। गोरखपुर स्थित कृषि विभाग के विशेषज्ञ प्रोफेसर आरआर सिंह के अनुसार, मिलेट्स न केवल पोषण से भरपूर हैं, बल्कि पर्यावरण और जल संरक्षण के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण फसलें हैं।
स्वास्थ्य के लिए क्यों जरूरी हैं मोटे अनाज?
मिलेट्स का नियमित सेवन कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं को दूर रखने में सहायक हो सकता है। इनमें फाइबर, प्रोटीन और आवश्यक खनिजों की प्रचुरता होती है, जो पाचन तंत्र को मजबूत रखने के साथ-साथ हृदय स्वास्थ्य में सुधार करते हैं। प्रोफेसर आरआर सिंह ने स्पष्ट किया कि बाजरा, रागी, ज्वार, कोदो, कुटकी, सावां, कांगनी और चीना जैसे 8 प्रमुख मिलेट्स का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी कम या मध्यम होता है। यही कारण है कि इन्हें संतुलित मात्रा में लेने से रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, जो विशेषकर डायबिटीज के मरीजों के लिए लाभदायक है।
खेती और जल संरक्षण में मिलेट्स की भूमिका
मिलेट्स की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें उगाने के लिए धान या गेहूं जैसी अन्य फसलों की तुलना में बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। यह जलवायु परिवर्तन के दौर में एक टिकाऊ विकल्प बनकर उभरे हैं। चूंकि भारत के कई हिस्सों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, ऐसे में कम पानी में उगने वाली इन फसलों को बढ़ावा देना न केवल किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद है, बल्कि यह पारिस्थितिक तंत्र के लिए भी एक बेहतरीन कदम है।
प्रमुख मिलेट्स की सूची:
- बाजरा: आयरन और प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत।
- रागी: कैल्शियम से भरपूर, जो हड्डियों को मजबूती देता है।
- ज्वार: ग्लूटेन-मुक्त और पाचन में सहायक।
- कोदो और कुटकी: कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले अनाज।
- सावां, कांगनी और चीना: एंटीऑक्सीडेंट्स और फाइबर के प्रमुख केंद्र।
आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा और पोषण स्तर को सुधारने के लिए मोटे अनाजों की खेती और खपत को और अधिक प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है। इन पारंपरिक अनाजों को फिर से अपनाना स्वास्थ्य की दृष्टि से एक क्रांतिकारी बदलाव साबित हो सकता है।