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कुशीनगर: डीआईओएस कार्यालय में लिपिक के तबादले पर विवाद, रिलीव करने में देरी पर उठ रहे सवाल

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तबादला आदेश के बावजूद सुभाष यादव को रिलीव न करने पर उठे सवाल

कुशीनगर के जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) कार्यालय में एक लिपिक के स्थानांतरण को लेकर मचे घमासान ने प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। शासन द्वारा सुभाष प्रसाद यादव का तबादला बलिया किए जाने के बावजूद, उन्हें अब तक कार्यमुक्त (रिलीव) नहीं किया गया है। विभाग के इस फैसले पर अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्या कारण है कि स्थानांतरण आदेश के बाद भी कर्मचारी कार्यालय में डटा हुआ है।

सीडीओ को दी गई दलील और सच्चाई का विरोधाभास

विभाग के अनुसार, जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्ता ने मुख्य विकास अधिकारी (CDO) को सूचित किया था कि सुभाष यादव के स्थान पर किसी अन्य कर्मचारी की तैनाती न होने के कारण उन्हें कार्यमुक्त करने से कार्यालय का काम प्रभावित हो सकता है। हालांकि, विभागीय सूत्रों का दावा है कि सुभाष यादव जिस पद पर कार्यरत हैं, वह पद डीआईओएस कार्यालय में सृजित ही नहीं है। यदि पद ही सृजित नहीं है, तो नए लिपिक के इंतजार में उन्हें रोकने की दलील पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं।

विद्यालय आवंटन में कथित वसूली के आरोप

इस पूरे मामले के पीछे शिक्षकों के विद्यालय आवंटन में हुई कथित गड़बड़ियों की चर्चा प्रमुखता से सामने आ रही है। विभागीय सूत्रों की मानें तो आयोग से आए लगभग 150 शिक्षकों के विद्यालय आवंटन के नाम पर प्रति शिक्षक 50 हजार रुपये तक की वसूली की चर्चाएं जोरों पर हैं। इन आरोपों में लिपिक सुभाष यादव का नाम भी जोड़ा जा रहा है, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। बहरहाल, रमेश तिवारी जैसे अन्य लिपिकों को महराजगंज तबादला होने पर तत्काल कार्यमुक्त कर दिया गया, जबकि सुभाष यादव के मामले में अपनाई गई अलग कार्यप्रणाली ने कई अनसुलझे प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

जांच की मांग और भविष्य की राह

सुभाष यादव की सेवा संबंधी रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में हैं। बताया जाता है कि उनकी नियुक्ति साढ़े तीन दशक पूर्व अनौपचारिक शिक्षा परियोजना में परिचारक के पद पर हुई थी। परियोजना समाप्त होने के बाद कनिष्ठ लिपिक के पद पर उनकी पदोन्नति और सेवा निरंतरता को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब केवल आधिकारिक सेवा पुस्तिका और दस्तावेजों की गहन जांच से ही संभव है। स्थानीय शिक्षा जगत और प्रशासन में अब इस बात की मांग उठ रही है कि शासन के स्थानांतरण आदेश का पालन सुनिश्चित किया जाए और संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति से लेकर वर्तमान तैनाती तक की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

(संवाददाता)

संवाददाता के संपादक

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