सरकारी जमीन आवंटन में नियमों की अनदेखी का आरोप
कुशीनगर के पडरौना विकास खंड के अंतर्गत भिसवा लाला गांव के ग्राम प्रधान रफीक अंसारी पर एक गंभीर आरोप सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रधान ने अपने ही गांव के बजाय सोहरौना गांव में सरकारी भूमि का पट्टा नियम विरुद्ध तरीके से हासिल किया है। इस मामले में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और संबंधित लेखपाल मार्कण्डेय मणि की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जांच के दायरे में राजस्व विभाग और लेखपाल
स्थानीय लोगों का दावा है कि पट्टा आवंटन प्रक्रिया में भारी अनियमितता बरती गई है। मुख्य रूप से यह सवाल उठाया जा रहा है कि दूसरे गांव के निवासी को सोहरौना गांव में पट्टा किस आधार पर और किन नियमों के तहत आवंटित किया गया? ग्रामीणों के अनुसार, तत्कालीन एसडीएम ने इस आवंटन को गलत मानते हुए पहले बेदखली के आदेश दिए थे और कब्जा हटवाया था, लेकिन आरोप है कि प्रधान ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर फिर से उस जमीन पर कब्जा जमा लिया है।
इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। सवाल यह है कि पट्टे के लिए पात्रता की जांच किस लेखपाल ने की थी और उन्होंने उच्चाधिकारियों को क्या रिपोर्ट सौंपी थी? क्या प्रस्ताव में नियमों का पालन किया गया था? प्रशासन को अब इस मामले की मूल पत्रावली, प्रस्ताव और स्वीकृति आदेशों की गहन जांच करने की आवश्यकता है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी जमीन को निजी लाभ के लिए कैसे इस्तेमाल किया गया।
भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच की मांग
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि सोहरौना गांव में यह कथित पट्टा हासिल करने के लिए संबंधित लेखपाल को मोटी रकम दी गई थी। इसके अतिरिक्त, यह भी दावा किया जा रहा है कि प्रधान रफीक के पिता और भाई के नाम पर भी इसी तरह सरकारी जमीन का आवंटन हुआ है। हालांकि, इन दावों की पुष्टि के लिए आधिकारिक साक्ष्यों की आवश्यकता है। प्रशासन से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है कि क्या इन आवंटनों में कोई मिलीभगत थी।
योगी सरकार के एंटी भू-माफिया अभियान पर सवाल
योगी सरकार द्वारा चलाए जा रहे एंटी भू-माफिया अभियान के तहत सरकारी जमीनों को कब्जा मुक्त कराना प्राथमिकता है। ऐसे में कुशीनगर के सोहरौना गांव का यह मामला प्रशासनिक तत्परता की परीक्षा ले रहा है। यदि जांच में अवैध कब्जा या आवंटन में अनियमितता साबित होती है, तो संबंधित अधिकारियों और लाभार्थी के खिलाफ सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। ग्रामीण अब इस मामले में उच्च स्तरीय जांच और पारदर्शी कार्रवाई की राह देख रहे हैं ताकि सरकारी संपत्ति को सुरक्षित रखा जा सके।